एँ जिन्दगी मैं तुझसे क्या चाहता हूं

A few thoughts,…

एँ जिन्दगी मैं तुझसे क्या चाहता हूं, असमंजस में हूं अब क्या चाहता हूं.

कभी शहर से शहर पल में पहुंचना चाहता हूं, कभी सड़क के लिए पेड़ कटने से रोकना चाहता हूं.

कभी बिजली न रहने पर क्रोधित हो जाता हूँ, कभी अंधेरे में जुगनू पकड़ना चाहता हूं. 

एँ जिन्दगी मैं तुझसे क्या चाहता हूं, असमंजस में हूं अब क्या चाहता हूं.

कभी वातानुकूलित वातावरण में ही रहना चाहता हूं, कभी सिर्फ ताज़ी हवा को ही पाना चाहता हूं. 

कभी फोन पर तकनीक का मज़ा चाहता हूं, कभी सिर्फ अपनो के संग बतियाना चाहता हूं.

एँ जिन्दगी मैं तुझसे क्या चाहता हूं, असमंजस में हूं अब क्या चाहता हूं.

कभी दुनिया की खबर बस पल में चाहता हूं, कभी अलगावादी अफवाह को फैलने से रोकना चाहता हूं. 

कभी रोज की भागदौड़ में आगे निकलना चाहता हूं, कभी सिर्फ धीरे धीरे साइकिल चलाना चाहता हूं. 

एँ जिन्दगी मैं तुझसे क्या चाहता हूं, असमंजस में हूं अब क्या चाहता हूं.

कभी बड़ो की तरह सारे निर्णय लेना चाहता हूं, कभी बेपरवाह, बेखबर, सिर्फ बचपना बिताना चाहता हूं. 

कभी पैसे की दौड़ में भागना चाहता हूं, कभी पैसे की दौड़ से खुद को हटाना चाहता हूं. 

एँ जिन्दगी मैं तुझसे क्या चाहता हूं, असमंजस में हूं अब क्या चाहता हूं.

कभी महंगे झूले के मज़े चाहता हूं, कभी पेड़ के नीचे रस्सी का झूला, झूलना चाहता हूं. 

कभी तो नई फिल्म, मॉल में देखना चाहता हूं, कभी दादा – दादी सें कहानी सुनना चाहता हूं. 

एँ जिन्दगी मैं तुझसे क्या चाहता हूं, असमंजस में हूं अब क्या चाहता हूं.

….. बस असमंजस में हूं यह क्या चाहता हूं.

Leave a Reply