यूं चाहत उभार के

चले दिल की ख़्वाहिशों में
ये चंद दिन गुज़ार के
भला दिल को क्या मिलेगा,
यूँ चाहत उभार के

खिली-खिली चाँदनी थी
खिली-खिली रात भी
जागे-जागे ख़्वाब भी थे
जागी-जागी रात भी
खुले-खुले आसमाँ में
तारे हज़ार थे
भला दिल को क्या मिलेगा,
यूँ चाहत उभार के

करें जुस्तजू भी क्या हम
करें आरज़ू भी क्या
मेरी जान-ऐ-जां बता दो
करें गुफ़्तगू भी क्या
बढ़े सूने रास्तों में
सब कुछ हार के
भला दिल को क्या मिलेगा
यूँ चाहत उभार के

गुलों को तलाशते थे
बहारों के बाद भी
सूने-सूने रास्तों में
किया इंतज़ार ही
ढले यूँ ही ख़ाब मेरे
सब कुछ उजाड़ के
भला दिल को क्या मिलेगा
चाहत उभार के

चले दिल की ख़्वाहिशों में
ये चंद दिन गुज़ार के
भला दिल को क्या मिलेगा
चाहत उभार के

{ निर्मला त्रिवेदी }
26-5-2018
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