बांसुरी से सीख..

बांसुरी से सीख ले एक नया सबक . . . . .
ऐ जिन्दगी-
लाख सीने में जख्म हो फिर भी गुनगुनाती है..!!

उम्र का पानी…

खतरे के
निशान से ऊपर बह रहा है
उम्र का पानी…

वक़्त की बरसात है कि
थमने का नाम नहीं
ले रही…

आज दिल कर रहा था,
बच्चों की तरह रूठ ही जाऊँ,
पर…

फिर सोचा,
उम्र का तकाज़ा है,
मनायेगा कौन…

रखा करो नजदीकियां,
ज़िन्दगी का कुछ भरोसा
नहीं…

फिर मत कहना
चले भी गए
और बताया भी नहीं…

चाहे जिधर से गुज़रिये,
मीठी सी हलचल
मचा दीजिये…

उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है,
अपनी उम्र का
मज़ा लिजिये….

*””सदा मुस्कुराते रहिये””*☺

क़त्ल का इल्ज़ाम

रिहा हो गए बा-इज़्ज़त वो
मेरे क़त्ल के इल्ज़ाम से

शोख़ निगाहों को, अदालत ने,
हथियार नहीं माना

जब कभी भी मन उदास होता है

जब कभी भी मन उदास होता है,
तन्हा होने का अहसास होता है,

क्यों ख़ुशी पल में यू रूठ जाती है,
ऐसा क्यों अक्सर मेरे साथ होता है,

मत गिनाना ऐब किसी के भी यंहा,
आइना हर किसी के पास होता है,

तुम छुपा लो गुनाह चाहे कितने भी,
वँहा एकदिन सबका हिसाब होता है,

कैसे जाने कि कौन अपना है,
यंहा हर इक चेहरे पे नकाब होता है,

ज़िंदगी का रायता..

*हम तन्हा ही चले थे…*
*ज़िंदगी का दही जमाने*
*रास्ते में बूंदियाँ मिलती गईं…*
*और ज़िंदगी का रायता बन गया।*

दोस्तो से रिश्ता रखा करो जनाब…

देखी जो नब्ज मेरी,
हँस कर बोला वो हकीम :

“जा जमा ले महफिल पुराने दोस्तों के साथ,
तेरे हर मर्ज की दवा वही है।”

दोस्तो से रिश्ता रखा करो जनाब…
ये वो हक़ीम हैं
जो अल्फ़ाज़ से इलाज कर दिया करते हैं।

खींच कर उतार देते हैं उम्र की चादर,
ये कम्बख्त दोस्त…
कभी बूढ़ा नहीं होने देते।

बच्चे वसीयत पूछते हैं,
रिश्ते हैसियत पूछते हैं,
वो दोस्त ही हैं जो
मेरी खैरियत पूछते हैं…..

चांद भी क्या खूब है..

*चांद भी क्या खूब है,…*
*न सर पर घूंघट है,*
*न चेहरे पे बुरका,*
*कभी करवाचौथ का हो गया,*
*तो कभी ईद का,*
*कभी माशूक-ऐ सनम हो गया*
*तो कभी हो गया, मामा*

*ज़मीन पर होता, तो टूटकर विवादों मे होता,*
*अदालत की सुनवाइयों में होता*,
*अखबार की सुर्ख़ियों में होता,*

*शुक्र है आसमान में बादलों की गोद में है,…*
*इसीलिए ज़मीन में कविताओं और ग़ज़लों में महफूज़ है”*

धूप और छांव

*कामयाबी के सफ़र में धूप बड़ी काम आयी……*

*छाँव अगर होती तो कबके सो गए होते !!*

दर्द

“””” न “आँखों” से “छलकते” हैं, न “कागज” पर “उतरते” हैं”..
कुछ “दर्द” ऐसे भी होते हैं जो बस “भीतर” ही “पलते” हैं”…!!!